आज का भारतीय युवा दिखावे की ज़िंदगी जीने मे विश्वाश करने की और प्रवृत्त हो रहा है, परंतु भारतीय माहौल को देखते हुए युवा पीढ़ी में एक परिवर्तन की जरूरत है , एक लहर की जरुरत है उसे उभारे
उसकी दिखावे की जिंदगी से, जो उसे हकीकत से रूबरू करवाये।
आज का हर युवा खुद के लिए जीना चाहता है , पूछने पर जवाब ये मिलता है की ये तो आज का फैशन है. सब अकेले जिये जा रहे है। सुनने में आ रहा है की अच्छे दिन आने वाले है क्या वाकई अच्छे दिन आएंगे कभी उन बूढ़े माँ -बाप के लिए जो वृद्धाश्रम में ये सोचकर दिन काट रहे है की कभी उनके बच्चे आएंगे उनको घर ले जाने के लिए।
कल जब एक वृद्धाश्रम के सामने से गुजरा तो बाहर बैठे एक वृद्ध से मै बैठा की ताउजी आपके कोई औलाद नहीं है क्या , तो वो वृद्ध सज्जन भरी आँखों से बोले की बेटा औलाद नहीं होती तो आज वृद्धाश्रम में रहने का दुःख न होता , मै समझ गया उस वृद्ध व्यक्ति का संकेत की औलाद होना कोई फक्र की बात नहीं है बल्कि उस औलाद का हमारे प्रति वफादार होना फक्र की बात है.
आज के युवा को पश्चिमी संस्कृति का भूत सवार है और उसकी एवज मै उन्हें जो भी छोड़ना पड़ रहा है वो
छोड़ रहे है।
आज देश को जरुरत है उस लहर की जिसमे आज का युवा फिर से समझ सके अपने संस्कारो की महत्ता को , समझ सके अपनों के प्यार को , दुःख को , जज्बात को।
